गुरुवार, 17 मई 2012

सत्तू ने ली गरीबों जान, डॉक्टर-डॉक्टर चीखते रहे


गर्मी गरीबों का मौसम कहा जाता है इसकी वजह यह है कि इस मौसम में गरीब, जिनके शरीर पर कपड़े नहीं होते वो भी मजे में  जी लेते हैं। लेकिन,  इस गर्मी ने क्या दिन दिखा दिए। जी हां, गर्मी में काम से थके-मांदे गरीबों ने खा लिया सत्तू। रोज की तरह ही खाए थे सत्तू। लेकिन, 14 मई को क्या हो गया उस सत्तू में कि जैसे-जैसे वो पेट में जाता रहा और  जान वैसे ही बाहर निकलती रही। गर्मी और गरीबी का ऐसा वीभत्स चेहरा भी देखने को मिलेगा, कभी सोचा भी नहीं  होगा किसी ने। गर्मी से राहत और भूख पर काबू करने वाले सत्तू ने देखते ही देखते 11 मजदूरों की जान ले ली। बिहार के जहानाबाद जिले के राजा बाजार में भरी दोपहरी में जब मजदूरों के सुस्ताने का वक्त था,  तभी अफरा-तफरा मच गई। हर तरफ हाय-तौबा मची गयी । हालत बिगड़ती गई। सांसें उखड़ने लगी। मुंह से झाग निकलने लगे। जैसे सत्तू  पेट में जाकर खौलने लगा। मुंह से झाग, नाक से झाग। दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। क्या हो रहा है? क्या  होगा किसी को कुछ भी नहीं पता चल रहा था। शाम ढलने को आई। कौन कल का सूरज देख पायेगा, ये आशंका गहराने लगी। अस्पताल पहुंचाया गया बीमार मजदूरों को। लेकिन, गरीबों के अस्पताल में क्या होता है। गरीबों का अस्पताल कैसा होता है। इमरजेंसी की कौन कहे, पूरे जहानाबाद सदर अस्पताल में महज एक डॉक्टर रणविजय  सिंह और एक कर्मचारी को छोड़ दूसरा कोई भी नहीं था। मरीज करीब बीस थे। और डॉक्टर एक। बेचारा एक डॉक्टर क्या-क्या करता। कुल मिलाकर डॉक्टर भी यकायक ऐसी नौबत आने से अचंभे में था। उसे सूझ नहीं रहा था क्या करें। जितना बना किया। कईयों को पटना रेफर किया। जहानाबाद से पटना पचास किलोमीटर। यानि जिन्दगी और मौत के करीब एक एक सेकेंड हजार किलोमीटर की रफ्तार से पास आती जा रही थी और उपर से जिन्दगी धरती पर पचास किलोमीटर की दूरी पर था। ऐसे हालात में जिसकी आशंका थी, वही अनहोनी हुई। एक के बाद एक ग्यारह मजदूरों की जान चली गई। लेकिन प्रशासन ने महज नौ के ही सत्तू खाने से मौत होने की पुष्टि की। एक मजदूर की मौत का मतलब उसके परिवार वाले ही जानते है। खैर प्रशासन ने मुआवजे के तौर पर बिहार सरकार की ओर दी जाने वाली सहायता के तहत 2 लाख 61 लाख 500 रुपये की राशि हर मृतक के परिवार को दी गई। साथ में अंत्येष्टि के लिए कुछ और राशि। लेकिन, मरहम की इन बातों से ज्यादा अहम ये है कि हादसों की हकीकत को कोई झुठला नहीं सकता और न ही टाल सकता है। लेकिन, हादसों को कम करने की कोशिशें मुकम्मल हों तो काफी जिन्दगियां बचाई जा सकती हैं। जिसकी पूरी कमी नक्सल और गरीबी की मार से झूठते जहानाबाद में देखने को मिली। एक बार सोचिए तो ये घटना ठीक उस नरसंहार के जैसी थी, जिससे जहानाबाद के गांव जूझते रहे हैं। वैसी ही चीख-पुकार।  वैसा ही मातम। लेकिन, जिम्मेदार कौन? क्या वो सत्तू जिम्मेदार है, जिसमें ज़हरीला पदार्थ मिले होने की आशंका  जतायी जा रही थी। पुलिस महकमे ने सत्तू और कुएं के पानी को जांच के लिए भेजा कि इनमें से ही कोई जिम्मेदार है मौत के लिए। लेकिन, जिम्मेदारी से वो बच निकलने की कोशिश की, जो अस्पताल में रहते तो कईयों की जान बच जाती। जिन्दगी बचाने की कसम खाने वाले डॉक्टर जिम्मेदारी से भागे हुए थे। यहां तक कि सिविल सर्जन उषा सिंह भी शहर से बाहर थीं। जिन्होंने अपने गिरेबान को बचाने के लिए जिम्मेदारी डाल दी उन बेबस मजदूरों पर जो दोपहर से छटपटा रहे थे। सफाई दी कि देर से मजदूर अस्पताल में आए। तो मैडम। जब आए उस वक्त भी तो आपके  डॉक्टर नहीं आए और न ही आप आईं। डीएम और एसपी साहब ही केवल घटना स्थल पर पहुंचे। क्या मजदूर लाचार  थे। नहीं आ सकते थे। आपको खबर मिलने पर आपकी ये जिम्मेदारी नहीं की कि घटनास्थल पर ही वैकल्पिक व्यवस्था ईलाज की जाती। आप जिम्मेदारी किसी को देती या जिम्मेदारी समझती तो शायद ऐसा हो सकता था। मैडम आपका भी दोष नहीं है। बिहार में दूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों की बात छोड़िए, राजधानी पटना के आसपास के क्षेत्रों में कोई इमरजेंसी आ जाए तो आपके बेहतर चिकित्सा सेवा मिलने से रही। साफ है कि बिहार सरकार चिकित्सा सेवा को दुरुस्त करने के लिए जो भी करने का दावा करे। दवाएं एक्सपायर हो जाती हैं। बेकार में फेंक दी  जाती हैं। जला दी जाती हैं लेकिन, किसी को दी नहीं जाती। कभी नहीं सुनने अथवा देखने को मिला कि दवाएं फेंकने वाले सर्जन अथवा किसी चिकित्सीय प्रभारी पर कार्रवाई हुई हो। साफ है भय के बिना प्रीति संभव नहीं है। जीना मरना सब यहां भगवान भरोसे है। पिछले साल मुजफ्फरपुर और गया में इंसेफेलाइटिस से करीब दो सौ बच्चे अकाल मौत के शिकार हो गये। महीने भर से ज्यादा समय लग गया बीमारी को पता लगाने में। लेकिन साल भर बाद भी कोई रिपोर्ट नहीं आई। रिपोर्ट आकर भी क्या करेगी। क्योंकि हालात सुधरने से रहे। इच्छाशक्ति हो तब तो जिन्दगी बेहतर हो। बहरहाल, मजदूर चले गये। कई नरसंहारों का गवाह बना जहानाबाद कहिए तो एक बार फिर नरसंहार जैसे हालात का शिकार हुआ। बेबस आंसू बहाने और मुफ्लिसी का मातम मानने के सिवा मजदूरों के पास कुछ भी नहीं। मजदूरों को गर्मी ने बर्बाद तो किया ही, इस मौसम में शीतलता देने वाले सत्तू ने भी सितम ढा दिया।



राजीव रंजन विद्यार्थी 
(लेखक एक निजी समाचार चैनल में प्रोड्यूसर हैं)

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

श्री पद्मकान्त ठाकुर 'भगवान'
8 अप्रैल 2012 को शरीर छोड़ दिया।
Shri Padma Kanta Thakur 'Bhagwan'
मैं कुछ नहीं, मेरा कुछ नहीं, तुम सब, तुम्हारा सब प्रभो। 

रविवार, 4 दिसंबर 2011

तुर्कमेनिस्तान में राष्ट्रपति का फरमान-सालगिरह पर पेड़

वृक्ष लगाने का अभियान तो सारे देश में चल रहा है। बिहार के कई गांवों में लड़की के जन्म पर पेड़ लगाने की परंपरा है। भारत में तो पेड़ लगाने देखभाल करने और पूजा करने तक की परंपरा है। ज्ञान की परंपरा से यहां बच्चे बच्चे भी जानते हैं पेड़ पौधे भी सोते जगते हैं उनमें भी जीवन होता है। जिसे जगदीश चन्द्र बसु ने प्रमाणित कर दिया। सबसे मजेदार है जंगल की पूजा पेड़ की पूजा- मूले ब्रह्मा त्वचा विष्णु शाखा शंकरमेव च पत्रे पत्रे सर्वदेवायाम् वृक्ष राज्ञो नमोस्तुते ।। यह श्लोक पीपल वृक्ष के लिए है। धीरे धीरे धरती को बचाने मानवता को बचाने के लिए भारत की ओर लौट रहे हैं सभी लोग। राष्ट्रपति गुरबांगुली बर्दीमुखमेदोव का नया फरमान आया है कि शादी की हर सालगिरह पर किसी बगीचे में पेड़ लगाओ। जोड़ों को सभी स्मारकों का दौरा करना होगा। क्योंकि इससे बच्चों संस्कृति पारिवारिक मूल्यों और लोक परंपराओं को आदर देना सीखेंगे। फरमान के अनुसार 'विवाह महल' में अपनी शादी रजिस्टर कराने वाले जोड़े बगल में पेड़ लगाकर उसकी देखभाल किया करें। इतना ही नहीं शादी शुदा जोड़े अपने जीवन के हरेक प्रमुख अनुष्ठान और आयोजन में कोई न कोई पेड़ लगावें।

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

IIT-पीएम गो बैक, नहीं चाहिए डिग्री


आईआईटी कानपुर के एक छात्र ने प्रधानमंत्री के हाथों से डिग्री लेने से इंकार कर दिया। सिविल इंजीनियरिंग फाइनल का छात्र शशिशेखर और उनके साथियों ने तख्ती पर लिख रखा था पीएम गो बैक। ऐसे ही 1927 में जब साइमन कमीशन का गठन हुआ था और 1928 में जब भारत पहुंचा तो साइमन कमीशन गो बैक के साथ देश भर में भारी विरोध हुआ। लाला लाजपत राय ने नेतृत्व में साइमन कमीशन का भारी विरोध हुआ। भ्रष्टाचार की वहज से पनपा है अवसरवाद, आतंकवाद, नेताखरीदवाद, जनता सेवाथेरेपी, जातिवाद की राजनीति, सांप्रदायिकता की भीतरघातनीति, अमेरिकापरस्तीकरण, और भी बहुत कुछ। इन सबके पीछ भ्रष्टाचार है। खुद बने रहने के लिए सारे तंत्र को भ्रष्ट बना दो। भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे आन्दोलन की धार को कुंद करने के लिए एक भ्रष्टाचार की सहायता ली जा रही है। कई शाही और सलाहकार प्रायोजित हैं जो कभी वन्दे मातरम और कभी भारत माता की जय को भी आगे रखने हैं और किसी समाज को अपनी जागीर समझ लेते हैं जबकि वह समाज अपनी बुद्धि से चलने को तैयार है। मामला साफ है कि ऐसे लोगों की दुकानदारी बंद होने वाली है, अथवा साफ बात यह है कि ऐसे लोगों के अस्तत्व पर ही आ पड़ी है। रामलीला मैदान में जनता उमड़ रही है। कृष्णाष्टमी पर कृष्ण का अन्ना अवतार लोगों ने देखा। सांसदों का घेराव हो रहा है और उनके सुर भी बदलते जा रहे हैं। हद हो गई प्रधानमंत्री जी कि छात्र ने पीएम गो बैक कर दिया। आईआईटी दुनियां का मानक संस्थान है। प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री है। लेकिन-
जनता की रोके राह समय में दाब कहां
वो जिधर चाहती काल उधर ही मुड़ता है।

सोमवार, 22 अगस्त 2011

कई अन्ना की जरूरत अभी और पड़ेगी


राजीव रंजन विद्यार्थी, प्रोड्यूसर, सहारा समय

74 साल के अन्ना ने अनायास ही भोजपुर (बिहार) के स्वंत्रता सेनानी वीर कुंवर सिंह जी की याद दिला दी है। 80 साल की बूढ़ी हड्डी में जो जोश कुंवर जी का था, वही जोश अन्ना हजारे जी में भी दिख रहा है। अन्ना ने अनशन के जरिए एक बार फिर ये साबित कर दिया है कि जोश युवा शरीर में नहीं बल्कि संकल्प-शक्ति में होती है। मजबूत इरादों में होती है। अन्ना में न केवल वो संकल्प शक्ति दिखी है, बल्कि युवाओं को कैसे एकजुट किया जाता है? इस नब्ज को भी परखा है। युवा कल की ताकत हैं। इस ताकत को जैसे चाहें इस्तेमाल कर लें, लेकिन, ये भटकना नहीं चाहता। भटकाव के रास्ते पर चलते-चलते युवा इतना थक चुका है कि वो अन्ना के साथ चल पड़ा है। काश! अन्ना की ये शक्ति राजनीतिक चश्मे वालों को भी दिख जाती। देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही नहीं, सरकार के कई मंत्री भी बूढ़े हो गये हैं। वर्ना क्या वो अन्ना की तरह नहीं होते! उनमें ये शक्ति है ही नहीं। या फिर वो राजनीतिक चश्मे की वजह से ये सब देखना नहीं चाहते। न जाने वो इस देश को क्या देकर जाना चाहते हैं! वो भारत के प्रतिनिधि हैं। भारत जो चाहता है, जो जनता चाहती है। वो उसे छोड़कर अपनी पार्टी और अपनी चाहत को पूरा करना चाहते हैं। ऐसी ढीठाई का ही नतीजा हैं, अन्ना, उनकी टीम और देश के करोड़ों युवा। लेकिन, नक्कारखाने में तूती बोले या तंबूरा, फर्क क्या पड़ता है ? हजारे के बैठने के बाद नेता दनदनाकर उठ खड़े हुए हैं। उनके बैठने के बाद नेता हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं हैं। उन्हें हराने के लिए हजारों हथकंडे जोड़े जा रहे हैं। कुछ तो नसीहतें भी दे रहे हैं। हजारों रातें, हजारों दिन देखने वाले हजारे को हाथ में कर लेना इतना आसान थोड़े है। समाज का हर शख्स जिनके दिल में थोड़ी-सी भी ईमानदारी की तमन्ना है वो आज अन्ना के साथ है। अन्ना के साथ एक नहीं अनेक है, एक दूसरे को ये कहते हुए कि कब तक घूस दोगे? कब तक तलवे चाटते रहोगे। चमचागिरी करके बढ़ते रहोगे ? कब तक बेइमानों के बीच ईमानदारी की दुहाई देकर दाल-रोटी के लिए जूझते रहोगे? नेता से लेकर नौकरशाह तक जहां चमचागिरी और चूना लगाने की परिपाटी हो, वहां एक अन्ना की हिम्मत बड़ी काम आई। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की ये मुहिम इस मायने में और अहम हो गयी है कि दमघोटू माहौल में अन्ना जैसे लोगों ने दम तो दिखाया ! किसी ने करोड़ों लोगों के दिल में दबी जुबान को हिलने का खम तो दिया ! इस खम से देश के सामने आज करोड़ों लोग खम्भे की भांति सरकारी लोकपाल बिल के विरोध में उठ खड़े हुए हैं। देश में कानून की कोई कमी नहीं है। लेकिन, कानून को अपने हिसाब से मोड़ने वाले नेताओं के लिए अन्ना आज अभेद बन गए हैं। बड़े शर्म की बात है कि उम्र के इस पड़ाव में सरकार एक ईमानदारी भारतीय की ईमानदारी की परीक्षा ले रही है। उसे भूखे रहने पर मजबूर कर रही है। सत्याग्रह को दुराग्रह साबित करने पर तुली हुई है। मिल बैठकर जो सही हो, उसे करने पर आपत्ति क्या है? सरकार के रुख से साफ हो गया है कि आज तक जनता के मतलब की केवल बात होती रही है। जनता की ओर से चुनी गई सरकार भले बनती रही हो। वो केवल अपना फायदा देखती रही है। वर्ना क्या बात है कि सरकार अड़ियल हो गयी है। नक्सलवाद और माओवाद के साथ गरीबी के पनपने के पीछे सरकारी अड़ियलपन ही जिम्मेदार है। ये अब कहने में कोई गुरेज नहीं। मतलब से मतलब रखना यही नेताओं की सोच रही है। अन्ना की तरह कोई नेता भूखे रहकर देखे, कि भूख क्या होती है? अन्ना की तरह कोई नेता सोच कर देखे कि चिन्ता क्या होती है? अन्ना की तरह कोई नेता रह कर देखे कि मुफलिसी क्या होती है? अन्ना की तरह कोई अनशन करके देखे कि आंदोलन क्या होता है? अन्ना की तरह कोई जी कर देखे कि जिन्दगी क्या होती है? अन्ना की तरह बोलकर देखे कि बात कैसे बनती है? अन्ना की तरह कोई सो कर देखे कि नींद कैसे हराम होती है? यकीन के साथ कहता हूं कि आज कोई भी नेता ऐसा नहीं करेगा। क्योंकि ये नेता केवल दिखावे के हैं। हथकंडों के सहारे जीते है। हथकंडों के लिए जीते और मरते हैं। लेकिन, ऐसे जीने-मरने वालों के एक लिए हजारों नहीं एक अन्ना हजारे ही काफी है। तो कल के नेताओं अन्ना की तरह त्याग सीख लो। क्योंकि मूक-बधिरों को जगाने के लिए ऐसे कई अन्ना की जरूरत अभी और पड़ेगी।

शनिवार, 20 अगस्त 2011

सिब्बल का दर्द, जनता के हमदर्द!

कपिल सिब्बल की बात को हमेशा याद रखना पड़ेगा। अन्ना की गिरफ्तारी के बाद राज्यसभा और लोकसभा की कार्यवाही को याद रखना पड़ेगा। याद रखने लायक है ऐसा नहीं बल्कि याद रखना पड़ेगा। सिब्बल का बयान था सदन में उपस्थित सभी लोगों के लिए अर्थात् सभी सांसदों के लिए अथवा सांसदों के माध्यम से बाकी सभी नेताओं के लिए कि आप सभी अपने पैर में कुल्हाड़ी मार रहे हैं। अन्ना को समर्थन का मतबल नेता अपने पैर में कुल्हाड़ी मार रहे हैं। अन्ना की गिरफ्तारी का विरोध का सीधा सीधा मतलब अन्ना को समर्थन के रूप में ही देखा गया। सिब्बल का दर्द था या फिर सिब्बल की जीन्दगी का टूटता उद्देश्य, वे कह रहे थे कि एक बात समझ लीजिए कि आप लोग अपने पैर में कुल्हाड़ी मार रहे हैं। अर्थात् अगर अन्ना की ओर चले, भ्रष्टाचार पर हमला किया तो कुल मिलाकर घाटा आपको ही है अर्थात् नेताओं सांसदों को ही है। सिब्बल की मंशा क्या हो सकती है- कि आज हम सरकार में हैं कल हो सकता है कोई दूसरा दल रहे लेकिन सदन और नेतागिरी के भीतर से जो कुछ सुविधाएं और खेल वे कर सकते हैं, वो तो जारी रहेगा। संसद ऊपर है इसलिए यहां पहुंचने वाले भी स्वयं को जनता से ऊपर मानने लगते हैं। अब इस वर्चस्व पर आधात होने का भय सिब्बल को सता रहा है। इसलिए उन्होंने कहा था कि हम ही नहीं आप लोग सुविधा भोग रहे हैं। हम यहां आमने-सामने हैं तो क्या हुआ। आज समय आ गया है कि पक्ष-विपक्ष मिलकर अन्ना से निपट लेते हैं ताकि आने वाले समय में फिर अपनी सत्ता जमी रहे। प्रश्न उठता है कि देश में सर्वाधिक भ्रष्टलोग कौन हैं तो उत्तर इन्हीं तथाकथित खादीधारियों की ओर जाता है। उसके बाद ही अधिकारियों की बात हो सकती है। यह सच है कि नेताओं को खेलना भी अधिकारी ही सिखाते हैं लेकिन यह भी सच है कि नेताओं को इस खेल में कुछ खास नहीं करना पड़ता है, सदन में आवंटन पर चर्चा हुई, पारित हुआ, पहुंच गया इनके पास और लोगों तक जाते जाते क्या होता है यह बताने की जरूरत नहीं। घोटाले होते हैं तो पहले अधिकारी पकड़े जाते हैं लेकिन जड़ में नेता होते हैं यह बात खुलते खुलते आमतौर पर दब ही जाती है, कुछ ही खुल पाती है। सिब्बल या कांग्रेस की व्यथा यहीं से शुरू होती है। इन सांसदों को देखने वाला नापने वाला और निगरानी रखने वाला अगर कोई हो गया तो क्या होगा? ये लोग सदन में संन्यास भाव से तो आए नहीं हैं। इनमें ज्यादातर लोगों की जिन्दगी कई कई उपन्यास हैं। इसलिए सिब्बल सांसदों को उसकाने और सुलगाने की कोशिश की-हमाम में हम सभी है। उस पार न जाने क्या होगा? अन्ना की ओर मत बढ़ो ये रास्ता कुल्हाड़ी की ओर जाएगा और आप अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारेंगे। इसका दूसरा पक्ष बड़ा भयावह है। जनता के बीच हितैषी बनने वाले स्वयं को अलग रूप में रखते हैं और उन्हें जनता के बीच ही जनता की बातों से लेना देना रहता है। वास्तविक जिन्दगी... सबको ध्यान देना पड़ेगा।

"अन्ना" का मतलब समझे

अन्ना तिहाड़ में हो या तड़ीपार हों। उसूलों और इरादों के पक्के अन्ना से तिहाड़ की कालकोठरी भी डर गई। एक दिन की आंधी ने सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। लेकिन इस बीच जो घटनाक्रम हुआ वो कई सवालों को खड़ा कर गया। अन्ना को सरकार ने अपने सरकारी हथियारों का इस्तेमाल करते हुए भ्रष्टाचारियों और अपराधियों के अड्डे के बीच पहुंचा दिया। लेकिन, इस अड्डे पर भी अन्ना के कदम पड़ते ही असर दिखना शुरू हो गया। देश में आन्दोलन और तेज हो गया। शुरुआती आन्दोलन में ही इनते जनसैलाब की उम्मीद सरकार ने नहीं की हो गयी। इस जनआंदोलन ने साफ कर दिया कि दो हिस्सों में बंटा भारत किस कदर अर्से बाद एक हुआ है। सरकार को समझने में मुश्किल होने लगी कि अन्ना एक हैं या अनेक। लेकिन, जो इस जनआंदोलन का हिस्सा बने, उनके लिए ये समझना मुश्किल नहीं। हर किसी के माथे पर अन्ना, हर किसी के हाथ में अन्ना, हर किसी के आगे अन्ना, हर किसी के पीछे अन्ना। जो तंग है वो है अन्ना, जो तबाह है वो है अन्ना। हर तबके में अन्ना है, जिन्होंने इमरजेंसी देखी, वो कहते हैं कि अन्ना का ये आन्दोलन कांग्रेस सरकार की तरफ से लगाई गई अघोषित दूसरी इमरजेंसी है। देश भर की जो तस्वीर दिख रही है। वहां हर कहीं अन्ना हैं। दिल्ली से तिहाड़ जेल में सात दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजे गये अन्ना। लेकिन, जनआंदोलन की आंधी इतनी तेज हुई कि तिहाड़ की कड़क भी हजारे के आगे हार गयी। लेकिन, सरकार की ओछी मानसिकता इससे साफ हो गयी। अन्ना को जेल में उनके बीच रखने का कुचक्र रचा गया जो लाखों नहीं, करोड़ों-अरबों के भ्रष्टाचारी हैं। सोचिए ईमानदारी और बेइमानी कभी साथ-साथ रह सकते हैं। ये ठीक उसी तरह था कि तेल और पानी की दोस्ती सरकार ने करानी चाही। लोगों के बीच ये चर्चा का विषय बन गया कि अन्ना की जगह भ्रष्टाचारियों के बीच है। भ्रष्टाचारियों की परछाई का खौफ दिखाया गया अन्ना को। लेकिन, अन्ना खौफ के खाकर कर पचा चुके हैं। वर्ना ऐसा आन्दोलन होता ही नहीं। अन्ना को जितना पकड़ने की कोशिश की जा रही है। अन्ना उतने फैलते जा रहे हैं। ठीक संकटमोचक हनुमान की तरह अपने देह का विस्तार कर रहे हैं। अन्ना अपने आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने के लिए चल पड़े हैं। और साथ में उनके आह्वान पर दो हिस्सों में बंटा समूचा भारत भी। अन्ना को समझने वाले ये भी समझ लें कि देश में एक इंसान क्या नहीं सकता। लोकतंत्र की सच्ची तस्वीर दिखा दी है अन्ना ने। 16 अगस्त से शुरू हुई अन्ना हजारे की अन्ना अगस्त क्रांति को देश की दूसरी आजादी की लड़ाई बताया जा रहा है। इस लड़ाई में एक अन्ना के साथ हजारों हाथ हैं। अन्ना के नाम में ही हजारे लगा है। फिर उनके साथ रहने वाले हजारों नहीं, लाखों-करोड़ों हैं। "अन्ना" समर्थकों के अलावा सभी को अपना मतलब समझा दिया है अन्ना ने। अब तो नासमझ समझ जाएं आर-पार पर उतरे एक अकेला अन्ना का मतलब।

-राजीव रंजन विद्यार्थी, प्रोड्यूसर, सहारा समय