मंगलवार, 17 अगस्त 2010
फिर महंगाई पर नियंत्रण करेंगे मनमोहन
एक फिर मनमोहन सिंह महंगाई पर नियंत्रण करेंगे। हालांकि ये बयान आज का नहीं है। यह बयान उस समय का भी है जब यूपीए सरकार के 100 दिन पूरे हुए थे। क्योंकि लोकसभा चुनाव के ठीक पहले उन्होंने चुनावी घोषणा की थी कि अगर वे दोबारा सत्ता में आते हैं तो 100 दिनों के भीतर महंगाई पर काबू पा लेंगे। लेकिन सत्ता में आने से 100वें दिन उन्होंने कहा कि महंगाई पर नकेल मुमकिन नहीं लेकिन वे जल्द ही कुछ उपाय करेंगे। प्रधानमंत्री उपाय करते रहे, महंगाई बढ़ती रही। योजनाओं की घोषणा करते रहे और य़ोजनाओं के पैसों को नौकरशाह की जेब में डालते रहे, महंगाई बढ़ती रही। लोकसभा में विपक्ष ने सवाल उठा दिया, अवरोध खड़ा कर दिया तो फिर बयान आया कि महंगाई को रोकने की कोशिश करेंगे। 64वें स्वतंत्रता दिवस मौके पर जब सारे देशवासी लाल किला से किसी मजबूत कदम की प्रतीक्षा कर रहे थे तो फिर वहीं बयान आया कि महंगाई कम करने की कोशिश करेंगे। वे घोषणाएं करते जा रहे हैं और महंगाई बढ़ती जा रही है।
रविवार, 8 अगस्त 2010
प्रेमी युगल की जिन्दगी और लोकतांत्रिक व्यवस्था
इसबार कोई सेक्यूलर नेता बोल नहीं रहा। इसबार इंडिया गेट पर कोई मोमबत्ती जुलूस नहीं निकला। प्रेमी जोड़े भागते फिर रहे हैं। आगरा के जुनैरा कमाल ने अरूण सिंह से शादी रचा ली है। आगरा कैंट के बीएसपी विधायक जुल्फीकार भुट्टो पर धमकाने का आरोप लगा है। विधायक के आदमी उन्हें खोजते हुए मुंबई तक पहुंच गए थे लेकिन मुंबई पुलिस ने दोनों के सर्टिफिकेट देख कर विधायक के लोगों को ही फटकार लगा दी। इधर, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इन दोनों के पक्ष में फैसला दिया है और आगरा के एसपी को इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी दी है। भारतीय संविधान के तहत ये लोग पति पत्नी हैं और इन्होंने कोई गलती नहीं की है फिर भी इनके पीछे लोग क्यों पड़े हैं। केवल इसलिए कि लड़की मुस्लिम है और लड़का हिन्दू। सवाल उठता है इनकी ओर से आवाज क्यों नहीं उठ रही। जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी क्या है और मुख्यमंत्री मायावती अपने विधायक पर नकेल नहीं कस पा रही हैं। जुनैरा और अरुण भागते फिर रहे हैं। आगरे का ताजमहल को तो लोग प्यार के नाम से ही जानते हैं लेकिन इसी आगरे के प्रेम दूसरे शहरों में दर दर की ठोकरें खा रहा है। कभी जयपुर तो कभी मुंबई तो कभी लखनऊ और उनके पीछे लगे हैं कुछ गुर्गे। तसलीमा का केस हो या कोलकाता के तोदी परिवार का, आवाज तो खूब उठी थी और सरकारें भी आगे बढ़ कर काम करती दिखीं। निरुपमा के केस में भी खूब मोमबत्ती मार्च हुआ लेकिन जुनैरा और अरूण के मामले में चुप्पी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है। इस मामले में आगरा पुलिस की भूमिका भी गजब की है। क्या पुलिस को भी भारतीय संविधान का पता नहीं? ऐसी पुलिस पर कैसे आम जनता भरोसा करे?
रविवार, 1 अगस्त 2010
रेलवे में भ्रष्टाचार का बोलबाला
रेलवे का मतलब भ्रष्टाचार हो गया है। स्टेशन मास्टर, टीटीई, जीआरपी, बाप रे बाप! रेलवे आम लोगों के लिए समस्या बन गई है। कई बार ऐसा लगता है कि रेल की यात्रा कहीं अंतिम यात्रा न हो जाए। अगर अंतिम यात्रा न भी हो तो वहां टीटीई नाम के यमराज आपको जरूर मिल जाएंगे। उससे भी बच निकले तो जीआरपी नाम के यमदूत से बचना मिश्किल है। इन सबकी कारगुजारियों से सभी को पाला पड़ जाता है। रिजर्वेशन नहीं है तो टीटीई छोड़ेंगे नहीं। गजब का भ्रष्टाचार है रेलवे में। प्लेटफॉर्म पर छोटी दूरी के लिए टिकट पर आरक्षण लेना हो तो आरक्षण चार्ज के अलावा टीटीई को अलग से सलामी चाहिए। वेडर्स भी परेशान हैं। उनसे पूछिए कि तुम्हारे सामान का दाम आमतौर पर दुकानों पर के दाम से डेड़ गुना क्यों है को वो यही कहेगा कि स्टेशन पर पैसे देने पड़ते हैं। आपके पास कुछ ज्यादा सामान दिख जाएं तो सुरक्षा के नाम पर जीआरपी मनमानी पर उतर जाएंगे और ठीकठाक रकम उगाह कर ही छोड़ेंगे। हां सचमुच किसी को कोई परेशानी हो जाए। बीमार पड़ जाए तो इससे इन लोगों को कोई मतलब नहीं रहता। ये सभी लोग भी उपर की दुहाई दे देते हैं कि हमें भी कहीं जमा करना पड़ता है। नए बहाल टीटीई के जलवे कुछ ज्यादा ही दिखाई देते हैं जैसे ये मान कर चल रहे हैं कि जब है जी..जी भर के पी। स्लीपर के यात्री भगवान भरोसे हैं। न तो शौचालय की हालत ठीक रहती है, न बेसिन में पानी आता है, न ही कहीं सफाई का नाम मिलता है और ना ही बर्थ सुरक्षित रहता है। जेनरल की बात तो दूर की है। एसी वाले को थोड़ी राहत है। रेलवे के कर्मचारियों में एक खास बदलाव देखने को मिल रहा है। ये लोग अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद इतने रहते हैं कि आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं। सवाल उठता है कि आखिर कैसे हो रही है बहाली और कौन लोग किस कटगरी के है जो ऐसे है कि उन्हें काम से लेना देना कम रह गया है।
शनिवार, 24 जुलाई 2010
अब क्या सोचना भी लाजमी नहीं?
जनता को क्या चाहिए? मेरे मन में एक अजीब सा सवाल उठ रहा है। अगर कहें कि जनता को तो बस सुख चैन चाहिए तो यह बात पूरी तरह से सही नहीं लगती। वरना उन्हें चैन की बातों क्यों नहीं अच्छी लगती। बेचैन करने वाले लोग सदन तक कैसे पहुंच रहे हैं। मुद्दों के जोर पर कैसे जनता दिशा बदल लेती है या फिर सीधे शब्दों में कहें तो दिशाहीन हो जा रही है। लालू-पासवान के बंद में बिहार में खूब गुंडागर्दी हुई। फिर विधानसभा में लोकतंत्र को शर्मसार करने की घटना हुई। कांग्रेस वाले सोलंकी के साथ भी उस दिन चुप रहे जब बंद के नाम पर सरेआम गुंडागर्दी हो रही थी, अब राज्य सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। महंगाई के बारे में ये लोग कुछ नहीं बोलते। अमेरिका की आर्थिक नीतियां देश में हावी होती जा रही हैं। खाद और डीजल पर इनकी मजबूरी है। सज्जन और टाइटलर को सीबीआई क्लीन चिट देकर नए सिरे से अमित शाह के पीछे लगी है, इसमें भी कुछ वैसा ही होगा। बोफोर्स और गैसकांड तिलहंडे में चला गया। सीमा पर हलचल है कश्मीर का जलना जारी है। आतंकी सिर उठा रहे हैं। नेता जी मुद्दे को डायवर्ट करने की राजनीति कर रहे हैं। इन्हें शिक्षा से कितना लेना देना है सभी जानते हैं लेकिन शिक्षा नीति यही लोग निर्धारित करते हैं। इन सबका व्यक्तिगत जीवन कैसा इस बात को लोग जानते हैं लेकिन चुनाव आते आते इनकी ही बातें जनता के सिर पर चढ़ कर कैसे बोलने लगती है। जनता इनकी बातों में बार बार क्यों आ जाती है।
रविवार, 11 जुलाई 2010
प्रधनमंत्री पद के लिए गीता की शपथ
प्रधानमंत्री के पद और गोपनीयता की शपत लेने के लिए हाथ में गीता भी रखी जा सकती है, ऐसा सोचना थोड़ा कठिन हो चला है लेकिन त्रिनिनाद टोबैगो के की पहली नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री कमला प्रसाद बिसेसर ने अपने पद की शपथ हाथ में गीता लेकर ली। 26 जून को नोस्ली (पोर्ट ऑफ स्पेन) में एक समारोह में देश के राष्ट्रपति श्री जार्ज मैक्सवेल रिचर्ड ने उन्हें पद की शपथ दिलाई। दुनियां के लिए यह एक अनोखी घटना है। अबतक गीता अथवा किसी भी भारतीय दर्शन से जुड़ी पुस्तकों को दूसरे अथवा दूसरे देशों के रिलीजियश बुक्स के रूप में देखा जाता रहा, जिसमें उस किताब को भी सबसे अच्छा और श्रेष्ठ बताया गया और उसमें वर्णित परमशक्ति ही उसी नाम से सबसे श्रेष्ट होते हैं लेकिन भारतीय धर्मग्रंथ या दर्शन में ईश्वर के सभी रूपों को परमशक्ति, परमसत्ता, भगवान यहां तक कि कण कण में विराजने वाला बताया है। जरूरत है निर्विकार रूप से इन्हें देखने की।
बुधवार, 7 जुलाई 2010
अब कौन करेगा सन थेरेपी
बिहार के बांका जिले के धोरैया-भगवानपुर में सन थेरेपी देखने को मिला था। सैकड़ों नहीं हजारों लोगों का मुफ्त इलाज, वो भी लीवर का, होते हुए इस इलाके के प्राय: सभी लोगों ने देखा। उगते सूरज के साथ कच्चा धागा और तांत लेकर सूजे हुए लीवर और वहां त्वचा के भीतर से साफ साफ दिखाई देने वाले नीले रंग के हो चुके नस और शिराओँ को महज 21 दिनों में ठीक कर, इतना ही नहीं कई बार तो खाट पर पड़े रोगियों को 21 दिनों के भीतर उठा कर दौड़ा देने की कूवत रखने वाले जगदीश मिश्र की कीर्ति को लोगों ने काफी नजदीक से या ऐसे कहें कि सबकुछ सामने साफ साफ देखा। आमतौर पर हरेक रविवार की सुबह देखा। अब वो जगदीश मिश्र संसार में नहीं रहे। 106 वर्ष की आयु में चलते फिरते जगदीश मिश्र ने 06जुलाई10 मंगलवार की सुबह अपना शरीर त्याग दिया। इलाके में उन्हें कोई ज्योतिषी और कोई तांत्रिक के रूप में जानते थे। हालांकि उनकी पढ़ाई कम हुई थी लेकिन शास्त्रों के जानकार के रूप में उनकी पहचान थी। आज भले ही कई रोगों के लिए सन थेरेपी प्रचलित हो रहा हो लेकिन जिसने उन्हें जब से देखा उसने उनके पास इस विद्या को जरूर देखा। यह एक परंपरागत शिक्षण रहा होगा। अब यह प्रक्रिया कहीं भी देखने या सुनने को नहीं मिलती। इससे भी खास बात एक और कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए वे एक संन्यासी थे। जिनलोगों ने उनका जीवन पास से देखा है वो जानते हैं कि कभी एक पैसा उन्होंने जमा नहीं किया। न तो उनका कोई बक्सा है और न ही कोई थैला जिसमें देहावसान के बाद कोई विरासत ढूंढ सके। मुटठी बांध कर आये थे खुले हाथ चल दिए। ये संदेश दूसरों को भी देते थे लेकिन उपदेश से ज्यादा अपने आचरण से। मन से हठी, हृदय से धनी, समाज के लिए योद्धा के रूप में, खेतों में पूरे किसान, स्वभाव से ज्ञानी और आध्यात्मिक-ऐसे थे जगदीश मिश्र।
सोमवार, 5 जुलाई 2010
भारत बंद रहा, जेडीयू क्यों खुल गए
महंगाई के मुद्दे पर भारत बंद रहा। लंबे समय के बाद एक बड़ा आन्दोलन देखने को मिला। बस सेवा, रेल रेवा यहां तक कि वायु सेवा भी जोरदार प्रभावित हुई, जिससे लोगों को काफी परेशानी झेलनी पड़ी। हालांकि ज्यादातर लोगों ने अपनी यात्रा पहले से नहीं करने की तैयारी कर ली थी। लोग खुद ही नहीं निकले। इस दौरान बिहार में फिर से नरेन्द्र मोदी के नाम पर राजनीति का मामला उठा। जेडीयू सांसद मोनाजिर हसन से नरेन्द्र मोदी पर टिप्पणी कर दी। इसके कई पहलुओं पर गौर करने की जरुरत है। मोनाजिर ने इसलिए मामला नहीं उठाया कि उन्हें नरेन्द्र मोदी से कुछ लेना देना है, बल्कि इसलिए उठाया कि तसलीमुद्दीन जेडीयू में शामिल हो गए हैं। ऐसे में बिहार में और सत्तारूढ़ दल में मुसलमानों का नेता कौन कहलाए? नीतीश पर मोनाजिर जिन कारणों से दबाव बनाने की कोशिश करते रहे हैं उसमें सेंध लगने की पूरे हालत खड़े हो गए हैं। तसलीमुद्दीन के जेडीयू में आने भर से लालू को झटका तो लगा ही है कांग्रेस के लिए भी झटका ही है। इतना ही नहीं नीतीश के साथ मोनाजिर की दूरी कभी चर्चा में थी, उसे बढ़ाने या पाटने की अब जरूरत नहीं लग रही है, इसलिए मोनाजिर की यह राजनीतिक मजबूरी थी कि नरेन्द्र मोदी को ही हथियार बनाया जाए। फिर भी, नरेन्द्र मोदी पर मोनाजिर के बयान को कई रूप में और संकेत में देखने की जरूरत है। क्योंकि, कांग्रेस लगातार बिहार में पैठ बनाने की कोशिश कर रही है।
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