बुधवार, 16 जून 2010
एंडरसन, कांग्रेस और राष्ट्रधर्म
कांग्रेस ने एंडरसन को भगाने के मामले में एक नया और शर्मनाक तर्क गढ़ लिया है। पार्टी की तरफ से लीगल सेल ने बयान जारी किया है कि एंडरसन को भगाना राष्ट्रधर्म था क्योंकि भोपाल के हालात बड़े खराब थे। उसे कोई मार देता तो क्या होता। यह दूसरा नया तर्क है। पहला अर्जुन सिंह के माथे सारा कुछ मढ़ने की कवायद और अब एंडरसन को भगाने को जायज ठहराना। इसके लिए कसाब का उदाहरण भी दे डाला है कि वह दोषी है लेकिन उसकी रक्षा में सरकार लाखों रूपये खर्च कर रही है। अर्जुन सिंह की चुप्पी और उनके उपर ही कांग्रेसियों का आरोप, उसके बाद एंडरसन को भगाने को तर्कसंगत बनाने की कोशिश करना, ये दोनों ही बातें एक ही कड़ी में है। कांग्रेस के सामने पहला लक्ष्य है राजीव गांधी को बचाना। विपक्ष बार बार राजीव गांधी को निशाना बनाने की कोशिश कर रहा है। इसलिए कांग्रेस के नेता यह एक नया बयान दे रहे हैं। पार्टी के नेता भी जानते हैं कि इससे बहुत असर पड़ने वाला नहीं है लेकिन कार्यकर्ताओं को बोलने का एक तर्क मिल जाएगा। अब अगर पीसी एलेक्जेंडर अपना मुंह खोलते हैं या कोई संकेत देते हैं तो फिर राजनीतिक बबंडर उठेगा और इसके लिए एक रास्ता कांग्रेसियों ने बना कर रख दिया है ताकि राष्ट्रधर्म के नाम पर कुछ बोला जा सके।
रविवार, 13 जून 2010
भोपाल गैसकांड: एंडरसन गया कैसे?:
एंडरसन को सुरक्षित भगाने की घटना अवाक करने वाली नहीं है। तह में जाने पर कई मामले मिल जाएंगे जो दूसरे देश के हैं और दोषी होने के बावजूद बचाने की कोशिश की गई है। 7 दिसंबर 1984 को एंडरसन भोपाल से सुरक्षित निकल गया। डीएम मोती सिंह, पायलट और एवीएशन के तत्कालीन डायरेक्टर के बयान ने भले ही तूफान खड़ा कर दिया हो, लेकिन अर्जुन सिंह चुप हैं। वे ही मुख्यमंत्री थे। शायद अर्जुन की नई पारी है चुप्पी। गांधी परिवार पर एसहान जताने का उन्हें एक बड़ा मौका हाथ लगा है। कांग्रेसी नेताओं के सामने एक ही बात है कि वे क्या करें क्या न करें। दिग्विजय सिंह ने राज्य सरकार को बचाने की कोशिश की तो बसंत साठे ने राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। सत्यव्रत चतुर्वेदी ने केन्द्र को बचाने की कोशिश की और राज्य सरकार यानि अर्जुन सिंह को बलि देने की तैयारी कर ली है। बूटा भी ऐसा ही कुछ बोल रहे हैं। जनार्दन द्विवेदी कहते हैं दिग्विजय और सत्यव्रत के बयान निजी हैं। पायलट और एविएशन डायरेक्तर यूनियन कार्बाइड से अर्जुन सिंह ने मोटा डोनेशन लिया था। अर्जुन अबतक इतना ही कह पाए हैं कि एंडरसन के बारे में उनको लेकर जो खबरे चल रही हैं वे सच नहीं हैं। अर्जुन जी! फिर सच क्या है? अब सवाल उठता है कि भोपाल से दिल्ली तक भले ही अर्जुन सिंह अपने मुख्यमंत्री पद का इस्तेमाल कर भेज दें लेकिन उसके बाद दिल्ली से अमेरिका के लिए आराम से कैसे रवाना हुआ एंडरसन। सवाल ये भी है कि कल तक केन्द्र में अर्जुन सिंह की तूती बोल रही थी लेकिन, इसबार चुनाव होते होते अर्जुन जी क्यों किनारे कर दिए गये। क्या 25 वीं बरसी पर उनको ही बलि बनाने का पूरा खाका तैयार था?
शनिवार, 27 मार्च 2010
होली और 'हाट'
होली के पावन त्योहार में
रंगों के मनभावन फुहार में
भींगे तन-मन अपना जीवन
गुलाल की खुशबू बयार में।
विक्रम संवत 2067 शुभ हो
चैत की गर्माहट अब हो
जीवन की रंगीनियां हो जब
क्यों न डूबें हम प्यार में।
पलाश के रक्तिम यौवन में
महुआ के मदमाते जीवन में
वन-प्रांतर में होता पतझड़
कोलाहल है गांव-जबार में।
याद करें आश्रम-जीवन हम
रंग-गुलाल में डूबा बचपन
चलों करें उसको तरो-ताजा
स्वागत है नेतरहाट परिवार में।
--राजेश रमण (सत्र 1981-88) rajeshraman451@gmail.com
{संप्रति नेतरहाट विद्यालय (पुस्तकालय) में कार्यरत}
रंगों के मनभावन फुहार में
भींगे तन-मन अपना जीवन
गुलाल की खुशबू बयार में।
विक्रम संवत 2067 शुभ हो
चैत की गर्माहट अब हो
जीवन की रंगीनियां हो जब
क्यों न डूबें हम प्यार में।
पलाश के रक्तिम यौवन में
महुआ के मदमाते जीवन में
वन-प्रांतर में होता पतझड़
कोलाहल है गांव-जबार में।
याद करें आश्रम-जीवन हम
रंग-गुलाल में डूबा बचपन
चलों करें उसको तरो-ताजा
स्वागत है नेतरहाट परिवार में।
--राजेश रमण (सत्र 1981-88) rajeshraman451@gmail.com
{संप्रति नेतरहाट विद्यालय (पुस्तकालय) में कार्यरत}
रविवार, 7 फ़रवरी 2010
राहुल गांधी के दौरे से किसको क्या मिला
शिवसेना से वाकयुद्ध के बीच 1 और 2 फरवरी 2010 को राहुल गांधी के बिहार दौरे के बाद देश की राजनीति में तूफान आ गया और तीन दिनों तक यह तूफान जारी रहा। राहुल गांधी के बिहार दौरे के पहले ही जेडीयू में टूट के समीकरण बन गए। प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह, सांसद प्रभुनाथ सिंह और पार्टी के प्रवक्ता शिवानन्द तिवारी की नाराजगी को हवा मिली। ललन सिंह ने नीतीश पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिय़ा लेकिन बाकी दोनों अभी चुप हैं। पार्टी में उपेन्द्र कुशवाहा की बढ़ती अहमियत ने कई नेताओं की नाराजगी बढ़ा दी है। जब ललन सिंह इस्तीफे की पेशकश कर रहे थे उस समय नीतीश ने कुछ अलग ही राग अलापा। उस समय वे पटना के मोना टॉकिज में थ्री इडियट्स फिल्म देखने गये थे। उसके बाद शुरू हुआ राहुल गांधी का बिहार दौरा। इसकी शुरूआत की चंपारण के भितहरवा गांधी आश्रम से, जहां से महात्मा गांधी ने नीलहे किसानों का आन्दोलन शुरू किया था। राहुल का विरोध यहां भी देखने को मिला लेकिन बात केवल गांधी जी के आश्रम तक जाने के लिए पास नहीं मिलने जैसी बातों तक आकर रुक गयी। इसके बाद वे दरभंगा पहुंचे। दरभंगा में विरोध हुआ। बात दबी दबी सी थी कि आखिर छात्रों ने क्या पूछा। बताया जाता है कि दरभंगा में पटना के छात्र राहुल राज जिसकी हत्या फर्जी एनकाउंटर में की गई थी, सवाल ऐसा ही कुछ पूछा गया था और राहुल ने चुप्पी साध कर बात टालने की कोशिश की। यहीं से हंगामा शुरू हुआ और इसमें 12 से ज्यादा छात्र घायल हो गए। उसके बाद गया में भी माहौल कुछ खास नहीं रहा। जब वे पटना की चल रहे थे तो उस समय पटना में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट काले झंडे के साथ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। दूसरे दिन भागलपुर में भी ऐसा ही हुआ। भागलपुर में भी मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट ने काले झंडे से ही राहुल का स्वागत किया। साथ ही वहां छात्रों के साथ ही हंगामा का ही माहौल रहा। पत्थरबाजी भी हुई। पटना में प्रेस कांफ्रेस के दौरान नीतीश के खिलाफ राहुल ने खूब कसीदे पढ़े। नीतीश का इंटेशन सही बताया लेकिन इम्प्लीमेंडटेशन को गलत बताया। राहुल गांधी के बिहार दौरे के समय एक बयान खूब जोर से उछला वो था मुंबई सबके लिए है। 26/11 मुंबई हमले के मुद्दे पर बयान देकर उन्होंने शिवसेना को मुद्दा दे दिया और 5 फरवरी को मुंबई दौरे के समय शिवसेना ने विरोध प्रदर्शन किया जगह जगह काले झंडे दिखाए। राहुल अपने पूर्व निर्धारित गन्तव्य स्थान तक तो पहुंचे लेकिन आम लोगों की जगह उन्होंने सरकार और पुलिस के जवानों के बीच ही रहना पड़ा। उनके रूट पर 144 धारा लागू थी। दिल्ली और महाराष्ट्र की सरकार ने सारी ताकत लगाकर राहुल के लिए माहौल के पक्ष माहौल बनाने की पूरी कोशिश। इस बीच शाहरूख खान का भी मुद्दा खूब उछला। पाकिस्तानी खिलाड़ियों के स्वागत की बात करते ही शाहरुख पर शिवसेना की आवाज उठ गई। लंदन से तो शाहरुख जरूर दहाड़ते रहे लेकिन मुंबई आते ही उनके तेवर ढीले पड़ गए। उन्होंने कहा कि वे ठाकरे के साथ हैं गलतफहमी की वजह से ही विवाद पैदा हुआ और वे जो कुछ हैं, मुंबई की वजह से हैं। इस पूरे खेल में शिवसेना ने मनसे को मात दे दी। मराठी प्रेम खूब जताया।
रविवार, 10 जनवरी 2010
झारखंड एक खास आईना
झारखंड एक खास आईना बन गया
लोकतंत्र का एक गजब का स्वरूप देखने को मिल रहा है झारखंड में कुल 81 विधायकों में से 59 विधायक दागी हैं जिनपर आपराधिक मामले चल रहे हैं। सत्तादल में 31 विधायकों पर अपराधिक मामले चल रहे हैं तो मुख्य विपक्षी कांग्रेस-जेवीएम के 25 विधायकों में से 19 पर मामले चल रहे हैं। अब जरा ये भी देखें कि कौन सा दल कितने पानी में है- झारखंड मुक्ति मोर्चा के 18 में 17 विधायकों पर अपराधिक मामले हैं एक केवल दुर्गा सोरेन की विधवा सीता सोरेन पर कोई केस नहीं है। बीजेपी के 18 में से 8 विधायकों पर आपराधिक मामले हैं। कांग्रेस के 14 विधायकों में 11 पर आपराधिक मामले हैं और जेवीएम के 11 में से 8 विधायकों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। आरजेडी के पांच में चार विधायकों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। आजसू से पांच में से चार विधायकों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। जेडीयू के दो में से एक विधायक और जेजेएम के एक मात्र विधायक पर मामले चल रहे हैं। इलेक्शन वॉच ने अपनी एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है। दूसरी तरफ, शिबू के शपथ ग्रहण के साथ साथ ही शशिनाथ झा हत्याकांड की सरगरमी भी सिर चढ़ी रही। दिल्ली में जन्तर मंतर पर शशिनाथ झा के परिजनों ने धरना दे दिया। कुड़को हत्याकांड में शिबू की पेशी की बात भी आ गई, हालांकि वे बाद में पेश होंगे।
नीरज की कविता याद आती है-
बेदाग सूत वाले सौदाग सूत वाले
इस हाट कुछ दुशाले, उस हाट कुछ दुशाले
कुछ कह रहे इसे ले कुछ कह रहे उसे
इसका कफ़न बना ले उससे बदन छुपा ले
मैं क्यों उसे कढ़ाऊं मैं क्यों उसे रंगाऊं
पर्दा उठा चुका हूं चादर बदल बदल कर
अपनी प्रकृति, व्यक्तिगत रंजिश, राजनीतिक वैमनष्य ने लोकतंत्र की धारा में कई अवरोध खड़े कर दिए हैं। ‘जनता का, जनता के द्वारा. और जनता के लिए’ की परिभाषा अब लोकतंत्र के लिए कितनी सार्थक रह गई है यह किसी से छिपी हुई नहीं रह गई है। एक परिभाषा ‘People get the government which they deserve’ अब तो ऐसा भी नहीं रह गया है। बात सीधी सी है कि हम चुनें कैसे? नहीं चुनें तो कैसे? छोड़ा नहीं जा सकता है और जब तीतर पकड़ने की कोशिश करते हैं बटेर कैसे मिल जाता है। सचमुच हाल के दिनों में हुए चुनाव में मतदाता अपने मतों का हिसाब खोजने की कोशिश में जुटता नजर आने लगा है।
लोकतंत्र का एक गजब का स्वरूप देखने को मिल रहा है झारखंड में कुल 81 विधायकों में से 59 विधायक दागी हैं जिनपर आपराधिक मामले चल रहे हैं। सत्तादल में 31 विधायकों पर अपराधिक मामले चल रहे हैं तो मुख्य विपक्षी कांग्रेस-जेवीएम के 25 विधायकों में से 19 पर मामले चल रहे हैं। अब जरा ये भी देखें कि कौन सा दल कितने पानी में है- झारखंड मुक्ति मोर्चा के 18 में 17 विधायकों पर अपराधिक मामले हैं एक केवल दुर्गा सोरेन की विधवा सीता सोरेन पर कोई केस नहीं है। बीजेपी के 18 में से 8 विधायकों पर आपराधिक मामले हैं। कांग्रेस के 14 विधायकों में 11 पर आपराधिक मामले हैं और जेवीएम के 11 में से 8 विधायकों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। आरजेडी के पांच में चार विधायकों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। आजसू से पांच में से चार विधायकों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। जेडीयू के दो में से एक विधायक और जेजेएम के एक मात्र विधायक पर मामले चल रहे हैं। इलेक्शन वॉच ने अपनी एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है। दूसरी तरफ, शिबू के शपथ ग्रहण के साथ साथ ही शशिनाथ झा हत्याकांड की सरगरमी भी सिर चढ़ी रही। दिल्ली में जन्तर मंतर पर शशिनाथ झा के परिजनों ने धरना दे दिया। कुड़को हत्याकांड में शिबू की पेशी की बात भी आ गई, हालांकि वे बाद में पेश होंगे।
नीरज की कविता याद आती है-
बेदाग सूत वाले सौदाग सूत वाले
इस हाट कुछ दुशाले, उस हाट कुछ दुशाले
कुछ कह रहे इसे ले कुछ कह रहे उसे
इसका कफ़न बना ले उससे बदन छुपा ले
मैं क्यों उसे कढ़ाऊं मैं क्यों उसे रंगाऊं
पर्दा उठा चुका हूं चादर बदल बदल कर
अपनी प्रकृति, व्यक्तिगत रंजिश, राजनीतिक वैमनष्य ने लोकतंत्र की धारा में कई अवरोध खड़े कर दिए हैं। ‘जनता का, जनता के द्वारा. और जनता के लिए’ की परिभाषा अब लोकतंत्र के लिए कितनी सार्थक रह गई है यह किसी से छिपी हुई नहीं रह गई है। एक परिभाषा ‘People get the government which they deserve’ अब तो ऐसा भी नहीं रह गया है। बात सीधी सी है कि हम चुनें कैसे? नहीं चुनें तो कैसे? छोड़ा नहीं जा सकता है और जब तीतर पकड़ने की कोशिश करते हैं बटेर कैसे मिल जाता है। सचमुच हाल के दिनों में हुए चुनाव में मतदाता अपने मतों का हिसाब खोजने की कोशिश में जुटता नजर आने लगा है।
गुरुवार, 17 सितंबर 2009
सायंस-टेक्नोलॉजी-त्याग-बलिदान-अस्थिदान
सायंस-टेक्नोलॉजी-त्याग-बलिदान-अस्थिदान
कुछ लोग 17 सितंबर मनाते हैं कुछ लोग नहीं भी मनाते हैं, कुछ लोगों को जानकारी नहीं है कि ऐसा भी कोई सितंबर होता है! इस दिन विश्वकर्मा जी के नाम पर मशीनों, गैरेज, मोटरवाहन, कंस्ट्रक्शन सर्जरिकल काम से जुड़े लोग अपने अपने साधनों यानि वाहन मशीन औजार आदि की साफ सफाई करते हैं और मानते हैं इसमें विश्वकर्मा जी का वास है इसलिए सारे साधनों उपकरणों की पूजा करते हैं। जहां विश्वकर्मा जी की मान्यता है वहां सभी सम्प्रदाय के लोग मनाते हैं क्योंकि उन्हीं मशीनों आदि से उनकी जिन्दगी चलती है। आज के दिन मशीनों का ऑफ डे है छुट्टी का दिन। सालों भर काम करने वाली मशीनों इस दिन खुराक लेती हैं नहाती धोती हैं तेल फुलेल लगाती हैं। अजीब सी बात है मशीनों में भी जीवन, आत्मा-परमात्मा जैसा कुछ बसता है। निश्चित रूप से यह भारत की ही बात रही होगी। वरना दूसरी जगह कौम और काले-गोरे नाम पर मनुष्य पर भी अंगुली उठा देते हैं मशीनों की बिसात ही क्या। सचमुच गजब का सा देश है भारत। हर मनुष्य में भगवान की बात तो करता ही है, मशीनों में भी भगवान खोज लेता है। ऐसे नहीं पश्चिम के महान विद्वान जादूटोना वाला देश कह कर खिल्ली उड़ाते हैं और अपने देश में भी ज्यादा पढ़े लिखे कुछ लोग । बात सही भी है। ऐसी क्या खासियत थी विश्वकर्मा जी में जो उनके नाम पर दिवस मनाया जाय। आवागमन अवरूद्ध कर दिया जाय। यही न कि वे निर्माण के देवता माने जाते रहे हैं। मशीन और आयुध के देवता के रूप में देखे जाते रहे हैं। रातों रात सैकड़ों मंदिर बना देने की कुबत रखने वालों में से हैं। ऐसा तो आज का एडवांस टेक्नोलोजी कमोवेश कर ही सकता है। फिर भी, काम करें हम, इंवेस्ट करें हम, फायदा मिले हमें, तो वे बीच में कहां से। और फिर, होता भी क्या है 17 सितंबर को। गाड़ियां बंद कर दो, मूर्ति बिठा लो, पूजा पाठ करा लो, ब्राह्मणों की पेटपूजा और जेब भराई करा दो, रात होते होते पार्टी सार्टी भी कर लो, हो गई विश्वकर्मा पूजा। इसमें से एक बात भी धर्मनिर्पेक्ष देश के लिए ठीक नहीं लग रहा। लेकिन क्या किया जाए। यही एक ऐसी पूजा है जिसमें कौम नहीं काम देखा जाता है। सांस चलती है मशीनों से तो सिर क्यों नहीं नवाया जाय। यहां कोई दूसरा नारा कभी काम नहीं करता। यह पूजा काफी दिनों से होती आ रही है। बहुत पुराने समय से। इतना कि जब एक एक सीरियल किलर हुआ करता वृत्तासुर। बड़ा बदमाश, राक्षस जैसा करता था, करता क्या था अरे राक्षस ही था। दुनियां के लोग तंगतबाह थे। कोई सामने आने की हिम्मत नहीं करता था। बड़े बड़े वीर उसके सामने शहीद हो गए। इन्द्र की बारी आई तो उनकी भी हालत गड़बड़ा गई। हार हार के भागते फिरने की नौबत आ गई। ये सबलोग मिलकर ब्रह्मा जी के पास गए तो ब्रह्मा जी ने एक रास्ता बताय़ा कि दधिचि की हड्डी से बज्र बनाओ उसी से वृत्तासुर को मार सकते हो, वरना अपनी खैर मनाओ। ये दधिचि कौन थे? कहते हैं उत्कट तपस्वी और महान ऋषि थे भाई। लेकिन उनको आत्महत्या करने कहेगा कौन? फिर भी विश्वकर्मा जी से मिलजुल कर सबलोग हाथ जोड़ कर महान ऋषि दधिचि के पास पहुंचे और कहा कि संसार की रक्षा के लिए आपकी शहादत चाहिए। आपकी हड्ड़ियों को गलाकर ही बज्र बनेगा जिससे वृत्तासुर का वध हो सकेगा। विचित्र देश है भारत। दधिचि बाबा मान गए। मान ही नहीं गए, समाज के लिए मर भी दिए। हड्डियों से बज्र बना। किसने बनाया था वह बज्र। विश्वकर्मा जी ने। विश्वकर्मा जी जो कोई भी रहे होंगे, लेकिन सबसे खतरनाक बात यह है कि विश्वकर्मा जी दधिचि जी के पिता थे। अपने पुत्र की हड्ड़ियां निकलवाईं, गलवाईं और उसका बज्र बना दिया। किसी का बच्चा स्कूल से आने में देर हो जाय तो! आसमान सिर पर चढ़ा आता है लेकिन यहां तो अपनी औलाद को अपनी ही आंखों के सामने खुशी खुशी निवेदन करके.....।
हडडियां गलीं, बन गया विकराल बज्र और मारा गया वृत्तासुर। संसार में शांति लौटी। एक रक्त रंजित युग का अंत हुआ। किसके कारण हुआ, विश्वकर्मा जी के कारण हुआ और इसके लिए खुशी खुशी उन्होंने अपने पुत्र का बलिदान कर दिया। आकलन करके, गणना-विचार कर, जोड़-घटाव करके देखा गया तो संयोग से वह दिन 17 सितंबर निकला। कोई माने या माने जो जानता है वह महापुरुष के प्रति श्रद्धा रहेगी ही।
कुछ लोग 17 सितंबर मनाते हैं कुछ लोग नहीं भी मनाते हैं, कुछ लोगों को जानकारी नहीं है कि ऐसा भी कोई सितंबर होता है! इस दिन विश्वकर्मा जी के नाम पर मशीनों, गैरेज, मोटरवाहन, कंस्ट्रक्शन सर्जरिकल काम से जुड़े लोग अपने अपने साधनों यानि वाहन मशीन औजार आदि की साफ सफाई करते हैं और मानते हैं इसमें विश्वकर्मा जी का वास है इसलिए सारे साधनों उपकरणों की पूजा करते हैं। जहां विश्वकर्मा जी की मान्यता है वहां सभी सम्प्रदाय के लोग मनाते हैं क्योंकि उन्हीं मशीनों आदि से उनकी जिन्दगी चलती है। आज के दिन मशीनों का ऑफ डे है छुट्टी का दिन। सालों भर काम करने वाली मशीनों इस दिन खुराक लेती हैं नहाती धोती हैं तेल फुलेल लगाती हैं। अजीब सी बात है मशीनों में भी जीवन, आत्मा-परमात्मा जैसा कुछ बसता है। निश्चित रूप से यह भारत की ही बात रही होगी। वरना दूसरी जगह कौम और काले-गोरे नाम पर मनुष्य पर भी अंगुली उठा देते हैं मशीनों की बिसात ही क्या। सचमुच गजब का सा देश है भारत। हर मनुष्य में भगवान की बात तो करता ही है, मशीनों में भी भगवान खोज लेता है। ऐसे नहीं पश्चिम के महान विद्वान जादूटोना वाला देश कह कर खिल्ली उड़ाते हैं और अपने देश में भी ज्यादा पढ़े लिखे कुछ लोग । बात सही भी है। ऐसी क्या खासियत थी विश्वकर्मा जी में जो उनके नाम पर दिवस मनाया जाय। आवागमन अवरूद्ध कर दिया जाय। यही न कि वे निर्माण के देवता माने जाते रहे हैं। मशीन और आयुध के देवता के रूप में देखे जाते रहे हैं। रातों रात सैकड़ों मंदिर बना देने की कुबत रखने वालों में से हैं। ऐसा तो आज का एडवांस टेक्नोलोजी कमोवेश कर ही सकता है। फिर भी, काम करें हम, इंवेस्ट करें हम, फायदा मिले हमें, तो वे बीच में कहां से। और फिर, होता भी क्या है 17 सितंबर को। गाड़ियां बंद कर दो, मूर्ति बिठा लो, पूजा पाठ करा लो, ब्राह्मणों की पेटपूजा और जेब भराई करा दो, रात होते होते पार्टी सार्टी भी कर लो, हो गई विश्वकर्मा पूजा। इसमें से एक बात भी धर्मनिर्पेक्ष देश के लिए ठीक नहीं लग रहा। लेकिन क्या किया जाए। यही एक ऐसी पूजा है जिसमें कौम नहीं काम देखा जाता है। सांस चलती है मशीनों से तो सिर क्यों नहीं नवाया जाय। यहां कोई दूसरा नारा कभी काम नहीं करता। यह पूजा काफी दिनों से होती आ रही है। बहुत पुराने समय से। इतना कि जब एक एक सीरियल किलर हुआ करता वृत्तासुर। बड़ा बदमाश, राक्षस जैसा करता था, करता क्या था अरे राक्षस ही था। दुनियां के लोग तंगतबाह थे। कोई सामने आने की हिम्मत नहीं करता था। बड़े बड़े वीर उसके सामने शहीद हो गए। इन्द्र की बारी आई तो उनकी भी हालत गड़बड़ा गई। हार हार के भागते फिरने की नौबत आ गई। ये सबलोग मिलकर ब्रह्मा जी के पास गए तो ब्रह्मा जी ने एक रास्ता बताय़ा कि दधिचि की हड्डी से बज्र बनाओ उसी से वृत्तासुर को मार सकते हो, वरना अपनी खैर मनाओ। ये दधिचि कौन थे? कहते हैं उत्कट तपस्वी और महान ऋषि थे भाई। लेकिन उनको आत्महत्या करने कहेगा कौन? फिर भी विश्वकर्मा जी से मिलजुल कर सबलोग हाथ जोड़ कर महान ऋषि दधिचि के पास पहुंचे और कहा कि संसार की रक्षा के लिए आपकी शहादत चाहिए। आपकी हड्ड़ियों को गलाकर ही बज्र बनेगा जिससे वृत्तासुर का वध हो सकेगा। विचित्र देश है भारत। दधिचि बाबा मान गए। मान ही नहीं गए, समाज के लिए मर भी दिए। हड्डियों से बज्र बना। किसने बनाया था वह बज्र। विश्वकर्मा जी ने। विश्वकर्मा जी जो कोई भी रहे होंगे, लेकिन सबसे खतरनाक बात यह है कि विश्वकर्मा जी दधिचि जी के पिता थे। अपने पुत्र की हड्ड़ियां निकलवाईं, गलवाईं और उसका बज्र बना दिया। किसी का बच्चा स्कूल से आने में देर हो जाय तो! आसमान सिर पर चढ़ा आता है लेकिन यहां तो अपनी औलाद को अपनी ही आंखों के सामने खुशी खुशी निवेदन करके.....।
हडडियां गलीं, बन गया विकराल बज्र और मारा गया वृत्तासुर। संसार में शांति लौटी। एक रक्त रंजित युग का अंत हुआ। किसके कारण हुआ, विश्वकर्मा जी के कारण हुआ और इसके लिए खुशी खुशी उन्होंने अपने पुत्र का बलिदान कर दिया। आकलन करके, गणना-विचार कर, जोड़-घटाव करके देखा गया तो संयोग से वह दिन 17 सितंबर निकला। कोई माने या माने जो जानता है वह महापुरुष के प्रति श्रद्धा रहेगी ही।
रविवार, 6 सितंबर 2009
देश के नाम संदेश
हम भले ही सोच लें कि हमारा भारत महान है, लेकिन हमारा भारत कई मायनों में आज भी कोसों पीछे रह गया हैा टेक्नोलोजी भारत में भले ही विकसित हो रही हो, पहनावा चाहे कितनो विदेशी या देशी हो गया हो हमारा भारत तभी महान होगा जब देश के हर नागरिक को रोटी नसीब होगी::::::*:::::*:::::*::::
हम कहते हैं कि देश की धड़कन गांवों में रहती हैा लेकिन कई गांवों के लोगों को आज भी खाने को अनाज नहीं मिलताा आज भी लोग आदिमानव की तरह जीवन यापन कर रहे हैंा लाखों बच्चे पैदा होने के पहले ही मर जाते हैं क्योंकि उनकी माएं कुपोषित होती हैं, यदि पैदा हो भी जाते हैं तो हजारों बच्चे कुपोषण के कारण अपना प्राण त्याग देते हैंा झारखंड जहां पैसों की कमी नहीं है लेकिन फिर भी लोग भूखों मर रहे हैंा आदिवासियों की स्थिति तो मत कहिए कई आदिवासी आज भी जंगलों पर निर्भर हैं और जंगल जनित फल पत्ते खा कर जीवन यापन कर रहे हैं। कई ने तो शहर का चेहरा तक नहीं देखा ।
प्रदेश के नेता मालोमाल हो रहे हैं। इनके पास इतना धन हो गया है कि सीबीआई हाथ पैर धो कर इनके पीछे पडी है।
यहां यह कह सकते हैं कि नेता मालोमाल हो रहे हैं और जनता कंगाल
अब आप ही बतायें कि जहां के नेता करोड़पति हों और जनता खाकपति वह प्रदेश कभी नम्बर वन कहला सकता है। झारखंड के नेता अपने प्रदेश को नम्बर वन कहते हैं लेकिन कैसे प्रमाणित कर दिखाए।
अब आप ही बतायें जिस देश के प्रदेशों की जनता भूखों मर रही हो वह देश कैसे महान हो सकता है।
हम कहते हैं कि देश की धड़कन गांवों में रहती हैा लेकिन कई गांवों के लोगों को आज भी खाने को अनाज नहीं मिलताा आज भी लोग आदिमानव की तरह जीवन यापन कर रहे हैंा लाखों बच्चे पैदा होने के पहले ही मर जाते हैं क्योंकि उनकी माएं कुपोषित होती हैं, यदि पैदा हो भी जाते हैं तो हजारों बच्चे कुपोषण के कारण अपना प्राण त्याग देते हैंा झारखंड जहां पैसों की कमी नहीं है लेकिन फिर भी लोग भूखों मर रहे हैंा आदिवासियों की स्थिति तो मत कहिए कई आदिवासी आज भी जंगलों पर निर्भर हैं और जंगल जनित फल पत्ते खा कर जीवन यापन कर रहे हैं। कई ने तो शहर का चेहरा तक नहीं देखा ।
प्रदेश के नेता मालोमाल हो रहे हैं। इनके पास इतना धन हो गया है कि सीबीआई हाथ पैर धो कर इनके पीछे पडी है।
यहां यह कह सकते हैं कि नेता मालोमाल हो रहे हैं और जनता कंगाल
अब आप ही बतायें कि जहां के नेता करोड़पति हों और जनता खाकपति वह प्रदेश कभी नम्बर वन कहला सकता है। झारखंड के नेता अपने प्रदेश को नम्बर वन कहते हैं लेकिन कैसे प्रमाणित कर दिखाए।
अब आप ही बतायें जिस देश के प्रदेशों की जनता भूखों मर रही हो वह देश कैसे महान हो सकता है।
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