शनिवार, 27 मार्च 2010

होली और 'हाट'

होली के पावन त्योहार में
रंगों के मनभावन फुहार में
भींगे तन-मन अपना जीवन
गुलाल की खुशबू बयार में।
विक्रम संवत 2067 शुभ हो
चैत की गर्माहट अब हो
जीवन की रंगीनियां हो जब
क्यों न डूबें हम प्यार में।
पलाश के रक्तिम यौवन में
महुआ के मदमाते जीवन में
वन-प्रांतर में होता पतझड़
कोलाहल है गांव-जबार में।
याद करें आश्रम-जीवन हम
रंग-गुलाल में डूबा बचपन
चलों करें उसको तरो-ताजा
स्वागत है नेतरहाट परिवार में।
--राजेश रमण (सत्र 1981-88) rajeshraman451@gmail.com
{संप्रति नेतरहाट विद्यालय (पुस्तकालय) में कार्यरत}

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

राहुल गांधी के दौरे से किसको क्या मिला

शिवसेना से वाकयुद्ध के बीच 1 और 2 फरवरी 2010 को राहुल गांधी के बिहार दौरे के बाद देश की राजनीति में तूफान आ गया और तीन दिनों तक यह तूफान जारी रहा। राहुल गांधी के बिहार दौरे के पहले ही जेडीयू में टूट के समीकरण बन गए। प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह, सांसद प्रभुनाथ सिंह और पार्टी के प्रवक्ता शिवानन्द तिवारी की नाराजगी को हवा मिली। ललन सिंह ने नीतीश पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिय़ा लेकिन बाकी दोनों अभी चुप हैं। पार्टी में उपेन्द्र कुशवाहा की बढ़ती अहमियत ने कई नेताओं की नाराजगी बढ़ा दी है। जब ललन सिंह इस्तीफे की पेशकश कर रहे थे उस समय नीतीश ने कुछ अलग ही राग अलापा। उस समय वे पटना के मोना टॉकिज में थ्री इडियट्स फिल्म देखने गये थे। उसके बाद शुरू हुआ राहुल गांधी का बिहार दौरा। इसकी शुरूआत की चंपारण के भितहरवा गांधी आश्रम से, जहां से महात्मा गांधी ने नीलहे किसानों का आन्दोलन शुरू किया था। राहुल का विरोध यहां भी देखने को मिला लेकिन बात केवल गांधी जी के आश्रम तक जाने के लिए पास नहीं मिलने जैसी बातों तक आकर रुक गयी। इसके बाद वे दरभंगा पहुंचे। दरभंगा में विरोध हुआ। बात दबी दबी सी थी कि आखिर छात्रों ने क्या पूछा। बताया जाता है कि दरभंगा में पटना के छात्र राहुल राज जिसकी हत्या फर्जी एनकाउंटर में की गई थी, सवाल ऐसा ही कुछ पूछा गया था और राहुल ने चुप्पी साध कर बात टालने की कोशिश की। यहीं से हंगामा शुरू हुआ और इसमें 12 से ज्यादा छात्र घायल हो गए। उसके बाद गया में भी माहौल कुछ खास नहीं रहा। जब वे पटना की चल रहे थे तो उस समय पटना में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट काले झंडे के साथ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। दूसरे दिन भागलपुर में भी ऐसा ही हुआ। भागलपुर में भी मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट ने काले झंडे से ही राहुल का स्वागत किया। साथ ही वहां छात्रों के साथ ही हंगामा का ही माहौल रहा। पत्थरबाजी भी हुई। पटना में प्रेस कांफ्रेस के दौरान नीतीश के खिलाफ राहुल ने खूब कसीदे पढ़े। नीतीश का इंटेशन सही बताया लेकिन इम्प्लीमेंडटेशन को गलत बताया। राहुल गांधी के बिहार दौरे के समय एक बयान खूब जोर से उछला वो था मुंबई सबके लिए है। 26/11 मुंबई हमले के मुद्दे पर बयान देकर उन्होंने शिवसेना को मुद्दा दे दिया और 5 फरवरी को मुंबई दौरे के समय शिवसेना ने विरोध प्रदर्शन किया जगह जगह काले झंडे दिखाए। राहुल अपने पूर्व निर्धारित गन्तव्य स्थान तक तो पहुंचे लेकिन आम लोगों की जगह उन्होंने सरकार और पुलिस के जवानों के बीच ही रहना पड़ा। उनके रूट पर 144 धारा लागू थी। दिल्ली और महाराष्ट्र की सरकार ने सारी ताकत लगाकर राहुल के लिए माहौल के पक्ष माहौल बनाने की पूरी कोशिश। इस बीच शाहरूख खान का भी मुद्दा खूब उछला। पाकिस्तानी खिलाड़ियों के स्वागत की बात करते ही शाहरुख पर शिवसेना की आवाज उठ गई। लंदन से तो शाहरुख जरूर दहाड़ते रहे लेकिन मुंबई आते ही उनके तेवर ढीले पड़ गए। उन्होंने कहा कि वे ठाकरे के साथ हैं गलतफहमी की वजह से ही विवाद पैदा हुआ और वे जो कुछ हैं, मुंबई की वजह से हैं। इस पूरे खेल में शिवसेना ने मनसे को मात दे दी। मराठी प्रेम खूब जताया।

रविवार, 10 जनवरी 2010

झारखंड एक खास आईना

झारखंड एक खास आईना बन गया

लोकतंत्र का एक गजब का स्वरूप देखने को मिल रहा है झारखंड में कुल 81 विधायकों में से 59 विधायक दागी हैं जिनपर आपराधिक मामले चल रहे हैं। सत्तादल में 31 विधायकों पर अपराधिक मामले चल रहे हैं तो मुख्य विपक्षी कांग्रेस-जेवीएम के 25 विधायकों में से 19 पर मामले चल रहे हैं। अब जरा ये भी देखें कि कौन सा दल कितने पानी में है- झारखंड मुक्ति मोर्चा के 18 में 17 विधायकों पर अपराधिक मामले हैं एक केवल दुर्गा सोरेन की विधवा सीता सोरेन पर कोई केस नहीं है। बीजेपी के 18 में से 8 विधायकों पर आपराधिक मामले हैं। कांग्रेस के 14 विधायकों में 11 पर आपराधिक मामले हैं और जेवीएम के 11 में से 8 विधायकों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। आरजेडी के पांच में चार विधायकों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। आजसू से पांच में से चार विधायकों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। जेडीयू के दो में से एक विधायक और जेजेएम के एक मात्र विधायक पर मामले चल रहे हैं। इलेक्शन वॉच ने अपनी एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है। दूसरी तरफ, शिबू के शपथ ग्रहण के साथ साथ ही शशिनाथ झा हत्याकांड की सरगरमी भी सिर चढ़ी रही। दिल्ली में जन्तर मंतर पर शशिनाथ झा के परिजनों ने धरना दे दिया। कुड़को हत्याकांड में शिबू की पेशी की बात भी आ गई, हालांकि वे बाद में पेश होंगे।
नीरज की कविता याद आती है-
बेदाग सूत वाले सौदाग सूत वाले
इस हाट कुछ दुशाले, उस हाट कुछ दुशाले
कुछ कह रहे इसे ले कुछ कह रहे उसे
इसका कफ़न बना ले उससे बदन छुपा ले
मैं क्यों उसे कढ़ाऊं मैं क्यों उसे रंगाऊं
पर्दा उठा चुका हूं चादर बदल बदल कर
अपनी प्रकृति, व्यक्तिगत रंजिश, राजनीतिक वैमनष्य ने लोकतंत्र की धारा में कई अवरोध खड़े कर दिए हैं। ‘जनता का, जनता के द्वारा. और जनता के लिए’ की परिभाषा अब लोकतंत्र के लिए कितनी सार्थक रह गई है यह किसी से छिपी हुई नहीं रह गई है। एक परिभाषा ‘People get the government which they deserve’ अब तो ऐसा भी नहीं रह गया है। बात सीधी सी है कि हम चुनें कैसे? नहीं चुनें तो कैसे? छोड़ा नहीं जा सकता है और जब तीतर पकड़ने की कोशिश करते हैं बटेर कैसे मिल जाता है। सचमुच हाल के दिनों में हुए चुनाव में मतदाता अपने मतों का हिसाब खोजने की कोशिश में जुटता नजर आने लगा है।

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

सायंस-टेक्नोलॉजी-त्याग-बलिदान-अस्थिदान

सायंस-टेक्नोलॉजी-त्याग-बलिदान-अस्थिदान

कुछ लोग 17 सितंबर मनाते हैं कुछ लोग नहीं भी मनाते हैं, कुछ लोगों को जानकारी नहीं है कि ऐसा भी कोई सितंबर होता है! इस दिन विश्वकर्मा जी के नाम पर मशीनों, गैरेज, मोटरवाहन, कंस्ट्रक्शन सर्जरिकल काम से जुड़े लोग अपने अपने साधनों यानि वाहन मशीन औजार आदि की साफ सफाई करते हैं और मानते हैं इसमें विश्वकर्मा जी का वास है इसलिए सारे साधनों उपकरणों की पूजा करते हैं। जहां विश्वकर्मा जी की मान्यता है वहां सभी सम्प्रदाय के लोग मनाते हैं क्योंकि उन्हीं मशीनों आदि से उनकी जिन्दगी चलती है। आज के दिन मशीनों का ऑफ डे है छुट्टी का दिन। सालों भर काम करने वाली मशीनों इस दिन खुराक लेती हैं नहाती धोती हैं तेल फुलेल लगाती हैं। अजीब सी बात है मशीनों में भी जीवन, आत्मा-परमात्मा जैसा कुछ बसता है। निश्चित रूप से यह भारत की ही बात रही होगी। वरना दूसरी जगह कौम और काले-गोरे नाम पर मनुष्य पर भी अंगुली उठा देते हैं मशीनों की बिसात ही क्या। सचमुच गजब का सा देश है भारत। हर मनुष्य में भगवान की बात तो करता ही है, मशीनों में भी भगवान खोज लेता है। ऐसे नहीं पश्चिम के महान विद्वान जादूटोना वाला देश कह कर खिल्ली उड़ाते हैं और अपने देश में भी ज्यादा पढ़े लिखे कुछ लोग । बात सही भी है। ऐसी क्या खासियत थी विश्वकर्मा जी में जो उनके नाम पर दिवस मनाया जाय। आवागमन अवरूद्ध कर दिया जाय। यही न कि वे निर्माण के देवता माने जाते रहे हैं। मशीन और आयुध के देवता के रूप में देखे जाते रहे हैं। रातों रात सैकड़ों मंदिर बना देने की कुबत रखने वालों में से हैं। ऐसा तो आज का एडवांस टेक्नोलोजी कमोवेश कर ही सकता है। फिर भी, काम करें हम, इंवेस्ट करें हम, फायदा मिले हमें, तो वे बीच में कहां से। और फिर, होता भी क्या है 17 सितंबर को। गाड़ियां बंद कर दो, मूर्ति बिठा लो, पूजा पाठ करा लो, ब्राह्मणों की पेटपूजा और जेब भराई करा दो, रात होते होते पार्टी सार्टी भी कर लो, हो गई विश्वकर्मा पूजा। इसमें से एक बात भी धर्मनिर्पेक्ष देश के लिए ठीक नहीं लग रहा। लेकिन क्या किया जाए। यही एक ऐसी पूजा है जिसमें कौम नहीं काम देखा जाता है। सांस चलती है मशीनों से तो सिर क्यों नहीं नवाया जाय। यहां कोई दूसरा नारा कभी काम नहीं करता। यह पूजा काफी दिनों से होती आ रही है। बहुत पुराने समय से। इतना कि जब एक एक सीरियल किलर हुआ करता वृत्तासुर। बड़ा बदमाश, राक्षस जैसा करता था, करता क्या था अरे राक्षस ही था। दुनियां के लोग तंगतबाह थे। कोई सामने आने की हिम्मत नहीं करता था। बड़े बड़े वीर उसके सामने शहीद हो गए। इन्द्र की बारी आई तो उनकी भी हालत गड़बड़ा गई। हार हार के भागते फिरने की नौबत आ गई। ये सबलोग मिलकर ब्रह्मा जी के पास गए तो ब्रह्मा जी ने एक रास्ता बताय़ा कि दधिचि की हड्डी से बज्र बनाओ उसी से वृत्तासुर को मार सकते हो, वरना अपनी खैर मनाओ। ये दधिचि कौन थे? कहते हैं उत्कट तपस्वी और महान ऋषि थे भाई। लेकिन उनको आत्महत्या करने कहेगा कौन? फिर भी विश्वकर्मा जी से मिलजुल कर सबलोग हाथ जोड़ कर महान ऋषि दधिचि के पास पहुंचे और कहा कि संसार की रक्षा के लिए आपकी शहादत चाहिए। आपकी हड्ड़ियों को गलाकर ही बज्र बनेगा जिससे वृत्तासुर का वध हो सकेगा। विचित्र देश है भारत। दधिचि बाबा मान गए। मान ही नहीं गए, समाज के लिए मर भी दिए। हड्डियों से बज्र बना। किसने बनाया था वह बज्र। विश्वकर्मा जी ने। विश्वकर्मा जी जो कोई भी रहे होंगे, लेकिन सबसे खतरनाक बात यह है कि विश्वकर्मा जी दधिचि जी के पिता थे। अपने पुत्र की हड्ड़ियां निकलवाईं, गलवाईं और उसका बज्र बना दिया। किसी का बच्चा स्कूल से आने में देर हो जाय तो! आसमान सिर पर चढ़ा आता है लेकिन यहां तो अपनी औलाद को अपनी ही आंखों के सामने खुशी खुशी निवेदन करके.....।
हडडियां गलीं, बन गया विकराल बज्र और मारा गया वृत्तासुर। संसार में शांति लौटी। एक रक्त रंजित युग का अंत हुआ। किसके कारण हुआ, विश्वकर्मा जी के कारण हुआ और इसके लिए खुशी खुशी उन्होंने अपने पुत्र का बलिदान कर दिया। आकलन करके, गणना-विचार कर, जोड़-घटाव करके देखा गया तो संयोग से वह दिन 17 सितंबर निकला। कोई माने या माने जो जानता है वह महापुरुष के प्रति श्रद्धा रहेगी ही।

रविवार, 6 सितंबर 2009

देश के नाम संदेश

हम भले ही सोच लें कि हमारा भारत महान है, लेकिन हमारा भारत कई मायनों में आज भी कोसों पीछे रह गया हैा टेक्‍नोलोजी भारत में भले ही विकसित हो रही हो, पहनावा चाहे कितनो विदेशी या देशी हो गया हो हमारा भारत तभी महान होगा जब देश के हर नागरिक को रोटी नसीब होगी::::::*:::::*:::::*::::
हम कहते हैं कि देश की धड़कन गांवों में रहती हैा लेकिन कई गांवों के लोगों को आज भी खाने को अनाज नहीं मिलताा आज भी लोग आदिमानव की तरह जीवन यापन कर रहे हैंा लाखों बच्‍चे पैदा होने के पहले ही मर जाते हैं क्‍योंकि उनकी माएं कुपोषित होती हैं, यदि पैदा हो भी जाते हैं तो हजारों बच्‍चे कुपोषण के कारण अपना प्राण त्‍याग देते हैंा झारखंड जहां पैसों की कमी नहीं है लेकिन फिर भी लोग भूखों मर रहे हैंा आदिवासियों की स्थिति तो मत कहिए कई आदिवासी आज भी जंगलों पर निर्भर हैं और जंगल जनित फल पत्‍ते खा कर जीवन यापन कर रहे हैं। कई ने तो शहर का चेहरा तक नहीं देखा ।
प्रदेश के नेता मालोमाल हो रहे हैं। इनके पास इतना धन हो गया है कि सीबीआई हाथ पैर धो कर इनके पीछे पडी है।
यहां यह कह सकते हैं कि नेता मालोमाल हो रहे हैं और जनता कंगाल
अब आप ही बतायें कि जहां के नेता करोड़पति हों और जनता खाकपति वह प्रदेश कभी नम्‍बर वन कहला सकता है। झारखंड के नेता अपने प्रदेश को नम्‍बर वन कहते हैं लेकिन कैसे प्रमाणित कर दिखाए।
अब आप ही बतायें जिस देश के प्रदेशों की जनता भूखों मर रही हो वह देश कैसे महान हो सकता है।

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

तो....मिल ही गई आजादी

अंग्रेज आए और भारत गुलाम हो गया। अंग्रेज गए और भारत आजाद हो गया। बस इतनी सी बात है। भारत को अगर सचमुच अंग्रेजों ने गुलाम बनाया तो इतने संघर्ष की जरूरत कैसे पड़ गई? कितने गोरी चमड़ी वाले रहे होंगे? यही कोई पांच हजार या फिर कुछ कम-ज्यादा। लेकिन मारे गए अर्थात् शहीद हुए कितने देशभक्त? सच पूछिए तो कोई गिनती ही नहीं है। नेता जी की बातों पर मत जाइए। उनकी जुबां पर शहीदों में से तीन के ही नाम होते हैं। चौथा नाम लेते समय व-व-व-व करते हुए जल्दी से सोच लेते हैं और कई बार तो दर्शक-श्रोता का मुंह देखकर बोलते हैं। पांच छह तो आमतौर पर लोग गिना लेते हैं, लेकिन उसके बाद नाम मालूम है तो पूरा नाम मालूम नहीं। पूरा नाम अगर मालूम है तो शहादत स्थल मालूम नहीं। किस कारण फांसी हुई या गोली शूली हुई यह मालूम नहीं। कभी कहीं से ऐसी सूचना या कार्यक्रम देखने को मिला है? जिसमें शहीदों के नाम का क्विज हो रहा हो। मैंने तो बचपन में शहीदों के नाम पर क्विज होते सुना देखा और भाग भी लिया था, लेकिन उसके बाद फिर कहीं ऐसा क्विज देखने-सुनने को भी नहीं मिला। आजादी मिल गई झंडा फहराने के लिए। कुर्ता टोपी लगाकर भाषण देने के लिए। स्कूलों-दफ्तरों और कुछ संस्थानों में जश्न-ए-आजादी मनाने के लिए। अच्छी बात है। लेकिन गुलामी क्या, गुलामी कैसे और गुलामी किन कारणों से? यह बात साफ साफ सामने नहीं आ रही। एक बात और, क्या ऐसा नहीं लग रहा है कि गुलाम भारत और आजाद भारत में केवल सिंहासन-कुर्सी का फर्क रह गया है? क्या शासनतंत्र वही नहीं रह गया है? शासन की नीति-सिद्धांतो में क्या-क्या अंतर आया है, इसका विस्तार से आकलन नहीं किया जाना चाहिए? धन विदेश से आ रहा है, कर्ज विदेश से आ रहा है, दवाइयां विदेश से आ रही हैं, और बीमारी भी विदेश से ही आ रही हैं, आर्थिक मंदी विदेश से, मंहगाई विदेश से, अनाज विदेश से, बीज विदेश से, और न जाने क्या-क्या विदेश से। जनता हिम्मत करती है, उत्पादन में लगी रहती है, एक कदम आगे बढ़ती है तो दो कदम पीछे धकेल दिया जाता है। हर साल उजड़ते आशियाने और भ्रष्टाचार की नई नई ईबारत लिख रहे हैं हम। फिर भी आजादी तो मिल ही गई है। शहीदों से प्रेरणा कबतक मिलपाती है यह देखना बाकी है।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

swine flu बचना है तो आ अब लौट चलें..

swine flu स्वाइन फ्लू
बचना है तो आ अब लौट चलें..
स्वाइन फ्लू दहशत बनकर देश पर टूटा है....दुनियां के बड़ छोटे ताकतवर कमजोर सभी तरह के देश इस बीमारी से परेशान हैं....भारत में विदेश से आने वाले हर मरीज पर खुफिया और सुरक्षा बलों से ज्यादा स्वास्थ्य विभाग की नजर रहने लगी है......जब ये बीमारी पहली बार भारत में देखा सुना गया तब चिकित्सकों ने इसके बचाव के जो उपाय बताए उसमें खून जांच कर तुरंत इलाज कराने का बातें ही ज्यादा थीं.....लेकिन बाद में धीरे धीरे स्वरों में बदलाव हो गया.....आयुर्वेद ने इसके आसान इलाज के दावे किए...योग गुरू ने ऐसे गुर बताए कि कम से कम दहशत तो वैसा नहीं रहा जैसा शुरूआती दौर में था......लेकिन असली बात....क्या कर रहे हैं एलोपैथ यानि अंग्रेजी दवा देने या लिख देने वाले चिकित्सक....हग और शेकहैंड से बचिए....पहला परहेज या पहली सावधानी....केवल पीड़ित ग्रसित और प्रभावित लोगों से ही नहीं बल्कि आपस में भी इन दिनों इन दोनों चीजों से जरूर परहेज करें....क्या पता किसके साथ में देह में मुंह में ये चीजें विद्यमान और वर्तमान हों....छू जाए लग जाए तो बस हो गया बंटाधार.....अरे भाई हम तो सदियों से चिल्ला रहे हैं कि किसी से मिलते समय प्रणाम करो नमस्ते करो बहुत हुआ तो पैर छू कर आदर श्रद्धा जता लो....इंफेक्शन से बचे रहोगे कोई संक्रमण नहीं होगा....इंप्रेशन बनेगा सो अलग....लेकिन अंग्रेज चले गए अंग्रेजियत में त्वरण लगा गए....चिकित्सक बार बार कह रहें हैं....हाथ मिलाने से इंफेक्शन होगा......और तो और दुनियां के बड़े और उन्नत कहलाने वाले देशों मं स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए एंटीबायोटिक्स बनाने पर रात दिन एक कर शोध किए जा रहे हैं.....लेकिन आपके घर में ऐसा नहीं है....हां स्वास्थ्य मंत्री भी खूब बयान देते फिर रहे हैं कि शोध चल रहा है जो पहले बनाएगा उसी से खरीद लेंगे...मंत्री गुणवत्ता भी ध्यान में रखिएगा...जमाना बड़ा खराब है....जो भी हो....आयुर्वेद के चिकित्सकों ने दवा के दावे ठोक दिए....भले कोई मंत्री ध्यान दे ना दे....अरे ऐसे ऐसे उपाय बता दिए हैं कि एक पैसा खर्च ना करना पड़े और स्वाइन फ्लू भी न हो....ये चीजें मेट्रो में सहज सुलभ है...तुलसी पत्ता, बेलपत्र, काली मिर्च, गिलाई जैसी चीजें....रेल में, बस में घर का वैद्य और नानी में के नुस्खे की तरह स्वाइन फ्यू को दूर रखने के कितने ही तरीके आ गए....फिर भी असली बात हाथ मिलाने से बचें चुंबन करने से बचें...कहीं से आते हैं हाथ पैर जरूर धोएं.....और अच्छे से धोएं....इसमें से कौन सी ऐसी बात है जो हम आपको दादा दादी माता पिता रिश्तेदार और आस पास के बड़े बूढ़ों ने नहीं बताया......इसलिए भी अब तो मानिए कि भारत की संस्कृति ही हम आपको और दुनियां को बचा सकता है....इससे पहले एड्स के मामले में भी संयम आदि की बातें ही ज्यादा कारगर बताई गईँ है.....